कुछ को प्यारी, इक दिन की छुट्टी,
कुछ को प्यारी, भारत की मिट्टी.
कुछ दुहराते याद पुरानी,
कुछ फरमाते नयी कहानी.
कुछ कह-कह कर, दिन भर
जग में हैं सबको, दिखलाते.
कुछ अपने ख़ामोश लबो से
आंसू में सब कुछ कह जाते.
देश-भक्ति ग़र चखी है तुमने
स्वाद जुबाँ में बाकी हैं,
दोस्त मेरे आ देख जरा फिर
काम बहुत से बाकी हैं.
ये दिन तो फिर से आएगा,
आ देखें हम क्या बाँट सकें,
इक पहल करें फिर छोटी सी,
ये धुंध ज़रा सी छांट सकें.
इक पहल करें फिर छोटी सी,
ये धुंध ज़रा सी छांट सकें.
Written : Saurabh Dixit, San Francisco, Aug-16th 2010 (2:30 PM)
कुछ को प्यारी, भारत की मिट्टी.
कुछ दुहराते याद पुरानी,
कुछ फरमाते नयी कहानी.
कुछ कह-कह कर, दिन भर
जग में हैं सबको, दिखलाते.
कुछ अपने ख़ामोश लबो से
आंसू में सब कुछ कह जाते.
देश-भक्ति ग़र चखी है तुमने
स्वाद जुबाँ में बाकी हैं,
दोस्त मेरे आ देख जरा फिर
काम बहुत से बाकी हैं.
ये दिन तो फिर से आएगा,
आ देखें हम क्या बाँट सकें,
इक पहल करें फिर छोटी सी,
ये धुंध ज़रा सी छांट सकें.
इक पहल करें फिर छोटी सी,
ये धुंध ज़रा सी छांट सकें.
Written : Saurabh Dixit, San Francisco, Aug-16th 2010 (2:30 PM)
beautiful words with a very meaningful message.....makes you think again and again.
ReplyDeleteबहुत बढ़िया कविता है...
ReplyDelete(Comments में से word verification हटा दें. बहुत असुविधा होती है.)
very nice!!!!
ReplyDelete