आँख और आसुंओं का रिश्ता, अजीब होता है
आँख भर आती है, जब आंसू करीब होता है
नज़रें बचा के सबकी, भीगती हैं अक्सर आँखे
पर आईने के सामने भला, कभी कोई रोता है.
साथ रहा हो दोनो का, भले ही बचपन का
झिझक बाकी बची है ज़हन में अब भी ज़रा
जो छलक पड़ती थीं, मासूमियत की चादर ओढ़े
आँखों की चौखट में, अब बुनती हैं वो शर्म-ओ-हया
आँखों की तरह, आसूं भी जुड़वाँ होते हैं
भले जुड़वां मगर, फ़ितरत से जुदा होते हैं
एक ग़म के कँधे पे, सिसकता रहता है अक्सर
एक खुशनुमा सा फ़िरता है, ख्वाबों के दर पर
आंसुओं को सम्हाला है, इस दिल ने कहीं
रो लेंगे हम भी, जो मिलेगी फ़ुरसत ही कभी
ऐ लब मुस्कुरा लो, ज़रा लम्हा दो लम्हा
कि नज़र ज़माने की लगी हैं, चहरे पे अभी...