आँख और आसुंओं का रिश्ता, अजीब होता है
आँख भर आती है, जब आंसू करीब होता है
नज़रें बचा के सबकी, भीगती हैं अक्सर आँखे
पर आईने के सामने भला, कभी कोई रोता है.
साथ रहा हो दोनो का, भले ही बचपन का
झिझक बाकी बची है ज़हन में अब भी ज़रा
जो छलक पड़ती थीं, मासूमियत की चादर ओढ़े
आँखों की चौखट में, अब बुनती हैं वो शर्म-ओ-हया
आँखों की तरह, आसूं भी जुड़वाँ होते हैं
भले जुड़वां मगर, फ़ितरत से जुदा होते हैं
एक ग़म के कँधे पे, सिसकता रहता है अक्सर
एक खुशनुमा सा फ़िरता है, ख्वाबों के दर पर
आंसुओं को सम्हाला है, इस दिल ने कहीं
रो लेंगे हम भी, जो मिलेगी फ़ुरसत ही कभी
ऐ लब मुस्कुरा लो, ज़रा लम्हा दो लम्हा
कि नज़र ज़माने की लगी हैं, चहरे पे अभी...
Arz hai ...
Monday, July 11, 2011
Monday, February 14, 2011
Valentine Day बुख़ार :)
कमबख्त दिन है कुछ ऐसा, फ़िरे है मुस्कुराता वो,
लिए इक दिल हथेली पे, कि गोया मुस्कुराया कोई,
फिजा भी बह रही ऐसी, ज़रा बहकी ही बहकी सी,
कि जी लो सब्र से थोड़ा, था ख्वाबों में जो आया वो..
लिए इक दिल हथेली पे, कि गोया मुस्कुराया कोई,
फिजा भी बह रही ऐसी, ज़रा बहकी ही बहकी सी,
कि जी लो सब्र से थोड़ा, था ख्वाबों में जो आया वो..
Monday, February 7, 2011
स्वतंत्रता दिवस
कुछ को प्यारी, इक दिन की छुट्टी,
कुछ को प्यारी, भारत की मिट्टी.
कुछ दुहराते याद पुरानी,
कुछ फरमाते नयी कहानी.
कुछ कह-कह कर, दिन भर
जग में हैं सबको, दिखलाते.
कुछ अपने ख़ामोश लबो से
आंसू में सब कुछ कह जाते.
देश-भक्ति ग़र चखी है तुमने
स्वाद जुबाँ में बाकी हैं,
दोस्त मेरे आ देख जरा फिर
काम बहुत से बाकी हैं.
ये दिन तो फिर से आएगा,
आ देखें हम क्या बाँट सकें,
इक पहल करें फिर छोटी सी,
ये धुंध ज़रा सी छांट सकें.
इक पहल करें फिर छोटी सी,
ये धुंध ज़रा सी छांट सकें.
Written : Saurabh Dixit, San Francisco, Aug-16th 2010 (2:30 PM)
कुछ को प्यारी, भारत की मिट्टी.
कुछ दुहराते याद पुरानी,
कुछ फरमाते नयी कहानी.
कुछ कह-कह कर, दिन भर
जग में हैं सबको, दिखलाते.
कुछ अपने ख़ामोश लबो से
आंसू में सब कुछ कह जाते.
देश-भक्ति ग़र चखी है तुमने
स्वाद जुबाँ में बाकी हैं,
दोस्त मेरे आ देख जरा फिर
काम बहुत से बाकी हैं.
ये दिन तो फिर से आएगा,
आ देखें हम क्या बाँट सकें,
इक पहल करें फिर छोटी सी,
ये धुंध ज़रा सी छांट सकें.
इक पहल करें फिर छोटी सी,
ये धुंध ज़रा सी छांट सकें.
Written : Saurabh Dixit, San Francisco, Aug-16th 2010 (2:30 PM)
परछाई...
छाँव को ले कर मचा बवाल, पंछी-सूरज गुस्से में लाल
भीड़ इकठ्ठा, करे सवाल, लाल-बुझक्कड़ बूझो हाल
भीड़ ने अपना रंग दिखाया, अपना-अपना गणित सुझाया,
कुछ लोगों ने मूढ़ हिलाया, कुछ ने अपना कान खुजाया,
कुछ ने थोड़े चने चबाये, कुछ ने अपने दांत दिखाए.
मसला फिरता रहा वहीँ पर...
आख़िर पंहुचा काज़ी के घर पर..
बादल काज़ी बनके बैठा, बोला अब सब धीरज रख्खो.
मैं सुनता हूँ दर्द तुम्हारा, आकर अपनी अर्जी कह दो,
पंछी फड़-फड़ कर के आया, छाँव मेरी है उसने गाया.
साथ लिए मै इसको फिरता, संग मेरे है ये भी चलता
जग जाने है सच्ची बात, न्याय करो तुम मेरे साथ
सूरज ने बिचकाया मुँह, कहा बात तू ध्यान से सुन
मुझ बिन किसकी कैसी छाया. चाल भले तू कैसी चुन
मुझ संग घूमे दिनभर जो, कैसे कहता तेरा है वो?
सुनकर सब की गहन दलील, बादल ने फिर बात बढाई
कहा तमाशा हुआ बहुत अब, खामोश किसी ने टांग अड़ाई
कहा कि सोचो, लड़ते किस पर?, किस पर है ये आँख लगायी?
परछाई तो परछाई है, बोलो किसके हाथ ये आई?
सूरज जितना तेज दिखाए, पंछी जितना पर फैलाये,
बोलो किसको नज़र ये आये, धरती गर न गोद बिछाये.
समय बदलता जिसको नितदिन, क्या दंभ उसी का भरते हो?
जिसको तुम हो अपना कहते,क्या मर्ज़ी से है चलती वो ?
चिंता छोडो, जग हँसने दो , परछाई को उन्मुक्त बना दो
बाँह गले में डाल के दौड़ो, मुस्कानों को साथ सजा लो.
Written by : Saurabh Dixit, Feb 7th 2011, 10 PM
Written by : Saurabh Dixit, Feb 7th 2011, 10 PM
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