Monday, February 7, 2011

स्वतंत्रता दिवस

कुछ को प्यारी, इक दिन की छुट्टी,
कुछ को प्यारी, भारत की मिट्टी.
       कुछ दुहराते याद पुरानी,
       कुछ फरमाते नयी कहानी.

कुछ कह-कह कर, दिन भर
जग में हैं सबको, दिखलाते.
     कुछ अपने ख़ामोश लबो से
    आंसू में सब कुछ कह जाते.

देश-भक्ति ग़र चखी है तुमने
स्वाद जुबाँ में बाकी हैं,
      दोस्त मेरे आ देख जरा फिर
      काम बहुत से बाकी हैं.

ये दिन तो फिर से आएगा,
आ देखें हम क्या बाँट सकें,
     इक पहल करें फिर छोटी सी,
     ये धुंध ज़रा सी छांट सकें.

इक पहल करें फिर छोटी सी,
ये धुंध ज़रा सी छांट सकें.

Written : Saurabh Dixit, San Francisco, Aug-16th 2010 (2:30 PM)

3 comments:

  1. beautiful words with a very meaningful message.....makes you think again and again.

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  2. बहुत बढ़िया कविता है...
    (Comments में से word verification हटा दें. बहुत असुविधा होती है.)

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