Monday, February 7, 2011

परछाई...


छाँव को ले कर  मचा बवाल, पंछी-सूरज गुस्से में लाल 
भीड़ इकठ्ठा, करे सवाल, लाल-बुझक्कड़ बूझो हाल 

भीड़ ने अपना रंग दिखाया, अपना-अपना गणित सुझाया,
कुछ लोगों ने मूढ़ हिलाया, कुछ ने अपना कान खुजाया, 
कुछ ने थोड़े चने चबाये, कुछ ने अपने दांत दिखाए.

मसला फिरता  रहा वहीँ पर...
आख़िर पंहुचा काज़ी के घर पर..

बादल काज़ी बनके बैठा, बोला अब सब धीरज रख्खो.
मैं सुनता हूँ दर्द तुम्हारा, आकर अपनी अर्जी कह दो, 

पंछी फड़-फड़ कर के आया, छाँव मेरी है उसने गाया.
साथ लिए मै इसको फिरता, संग मेरे है ये भी चलता 
जग जाने है सच्ची बात, न्याय करो तुम मेरे साथ  

सूरज ने बिचकाया मुँह, कहा बात तू ध्यान से सुन
मुझ बिन किसकी कैसी छाया. चाल भले तू कैसी चुन
मुझ संग घूमे दिनभर जो, कैसे कहता तेरा है वो?

सुनकर सब की गहन दलील, बादल ने फिर बात बढाई
कहा तमाशा हुआ बहुत अब, खामोश किसी ने टांग अड़ाई

कहा कि सोचो, लड़ते किस पर?, किस पर है ये आँख लगायी? 
परछाई तो परछाई है, बोलो किसके हाथ ये आई?

सूरज जितना तेज दिखाए, पंछी जितना पर फैलाये,
बोलो किसको नज़र ये आये, धरती गर न गोद बिछाये.

समय बदलता जिसको नितदिन, क्या दंभ उसी का भरते हो? 
जिसको तुम हो अपना कहते,क्या मर्ज़ी से है चलती वो ?

चिंता छोडो, जग हँसने दो , परछाई को उन्मुक्त बना दो
बाँह गले में डाल के दौड़ो, मुस्कानों को साथ सजा लो.


Written by : Saurabh Dixit, Feb 7th 2011, 10 PM

5 comments:

  1. wow.... nice.. very meaningful..... i specially like these 2 lines.....
    "सूरज जितना तेज दिखाए, पंछी जितना पर फैलाये,
    बोलो किसको नज़र ये आये, धरती गर न गोद बिछाये."

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  2. very meaningful.....a very sensible and beautiful representation of ones ego and how one can fight for it ...even for no reason....absolutely love it!

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  3. So typical of a desi crowd - very vivid

    कुछ लोगों ने मूढ़ हिलाया, कुछ ने अपना कान खुजाया, कुछ ने थोड़े चने चबाये, कुछ ने अपने दांत दिखाए.

    Hamaare Gulzar bhai - hamen kuch geet bhi bhejo na :)

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  4. यह कविता भी बहुत अच्छी है. बधाई.

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